अयोध्या के श्री राम चंद्र जी का ओरछा क्या है पुराना रिश्ता, देखिए 600 साल पुरानी इतिहास

इन दिनों भारत में उत्तर प्रदेश में श्री राम जन्म भूमि का भूमि पूजन होने वाला है और उसके बाद श्री राम की भव्य विशालकाय मंदिर बनना शुरू हो जाएगा हलक इसको लेकर विपक्ष काफी दुखी भी दिख रहा है क्योंकि अब तक यही हुआ है

कि तारीख पे तारीख तारीख पे तारीख केवल नीति नहीं है लेकिन अब 5 तारीख का दिन श्री राम मंदिर का आखरी दिन होगा जहां पर श्री राम जी की मंदिर का भूमि पूजन किया जाएगा उत्तर प्रदेश की योगी सरकार इसको लेकर अयोध्या को पूरी दुल्हन की सजा रही है।

लेकिन इसी बीच ओरछा के 600 साल पुराने रिश्ते को लेकर भी आपको जानकारी होनी चाहिए क्योंकि यह सारे तथ्य इतिहास के पन्नों में दब चुके हैं।

अयोध्या से मध्य प्रदेश की दूरी लगभग साडे 400 किलोमीटर दूर है अयोध्या के रामलला के साथ ही ओरछा के राजाराम भी हमेशा चर्चा में रहते हैं. अयोध्या से मध्य प्रदेश के ओरछा की दूरी तकरीबन साढ़े चार सौ किलोमीटर है, लेकिन इन दोनों ही जगहों के बीच गहरा नाता है. जिस तरह अयोध्या के रग-रग में राम हैं,

ठीक उसी प्रकार ओरछा की धड़कन में भी राम विराजमान हैं. राम यहां धर्म से परे हैं. हिंदू हों या मुस्लिम, दोनों के ही वे आराध्य हैं. अयोध्या और ओरछा का करीब 600 वर्ष पुराना नाता है. कहा जाता है कि 16वीं शताब्दी में ओरछा के बुंदेला शासक मधुकरशाह की महारानी कुंवरि गणेश अयोध्या से रामलला को ओरछा ले आईं थीं


पौराणिक कथाओं में हुआ है जिक्र ?

पौराणिक कथाओं के अनुसार ओरछा के शासक मधुकरशाह कृष्ण भक्त थे, जबकि उनकी महारानी कुंवरि गणेश, राम उपासक. इसके चलते दोनों के बीच अक्सर विवाद भी होता था. एक बार मधुकर शाह ने रानी को वृंदावन जाने का प्रस्ताव द‍िया पर उन्होंने विनम्रतापूर्वक उसे अस्वीकार करते हुए अयोध्या जाने की जिद कर ली. तब राजा ने रानी पर व्यंग्य किया क‍ि अगर तुम्हारे राम सच में हैं तो उन्हें अयोध्या से ओरछा लाकर दिखाओ


श्री रामचंद्र जी ने रखे तीन नियम ?

इस पर महारानी कुंवरि अयोध्या रवाना हो गईं. वहां 21 दिन उन्होंने तप किया. इसके बाद भी उनके आराध्य प्रभु राम प्रकट नहीं हुए तो उन्होंने सरयू नदी में छलांग लगा दी. कहा जाता है क‍ि महारानी की भक्ति देखकर भगवान राम नदी के जल में ही उनकी गोद में आ गए. तब महारानी ने राम से अयोध्या से ओरछा चलने का आग्रह किया तो उन्होंने तीन शर्तें रख दीं. पहली, मैं यहां से जाकर जिस जगह बैठ जाऊंगा, वहां से नहीं उठूंगा. दूसरी, ओरछा के राजा के रूप विराजित होने के बाद क‍िसी दूसरे की सत्ता नहीं रहेगी. तीसरी और आखिरी शर्त खुद को बाल रूप में पैदल एक विशेष पुष्य नक्षत्र में साधु संतों को साथ ले जाने की थी

Post a Comment

0 Comments